Friday, March 24, 2017

541. साथ-साथ...

साथ-साथ...  

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तुम्हारा साथ  
जैसे बंजर ज़मीन में  
फूल खिलना  
जैसे रेगिस्तान में  
जल का स्रोत फूटना!  
अक्सर सोचती हूँ  
तुममें कितनी ज़िन्दगी बसती है  
बार-बार मुझे वापस खींच लाते हो  
ज़िन्दगी में  
मेरे घर मेरे बच्चे  
सब से विमुख होती जा रही थी  
ख़ुद का जीना भूल रही थी!  
उम्र के इस ढलान पर  
जब सब साथ छोड़ जाते है  
न तुमने हाथ छुड़ाया  
न तुम ज़िन्दगी से गए  
तुमने ही दूरी पार की  
जब लगा कि  
इस दूरी से मैं खंडहर बन जाऊँगी!  
तुमने मेरे जज़्बातों को  
ज़मीन दी  
और उड़ने का हौसला दिया  
देखो मैं उड़ रही हूँ  
जी रही हूँ!  
तुम पास रहो  
या दूर रहो  
साथ-साथ रहना  
मुझमें ज़िन्दगी भरते रहना  
मुझमें ज़िन्दगी भरते रहना!  

- जेन्नी शबनम (24. 3. 2017)  

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Tuesday, March 21, 2017

540. नीयत और नियति...

नीयत और नियति...  

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नीयत और नियति  
समझ से परे है  
एक झटके में  
सब बदल देता है,  
ज़िन्दगी अवाक्!  
काँधे पर हाथ धरे  
चलते-चलते  
पीठ में गहरी चुभन  
अनदेखे लहू का फ़व्वारा  
काँधे पर का हाथ  
काँपता तक नहीं,  
ज़िन्दगी हत्प्रभ!  
सपनों के पीछे  
दौड़ते-दौड़ते  
जाने कितनी सदियाँ  
गुज़र जाती  
पर सपने 
न मुठ्ठी में  
न नींद में,  
ज़िन्दगी रूखसत!  
सुख के अम्बार को  
देखते-देखते  
चकाचौंध से झिलमिल  
दुख का ग़लीचा  
पाँवों के नीचे बिछ जाता,  
ज़िन्दगी व्याकुल!  
पहचाने डगर पर  
ठिठकते-ठिठकते  
क़दम तो बढ़ते  
पर पक्की सड़क  
गड्ढे में तब्दील हो जाती,  
ज़िन्दगी बेबस!  
पराए घर को  
सँवारते-सँवारते  
उम्र की डोर छूट जाती  
रिश्ते बेमानी हो जाते  
हर कोने में मौजूद रहकर  
हर एक इंच दूसरों का  
पराया घर पराया ही रह जाता,  
ज़िन्दगी विफल!  
बड़ी लम्बी कहानी  
सुनते-सुनते  
हर कोई भाग खड़ा होता  
अपना-पराया कोई नहीं  
मन की बात मन तक  
साँसों की गिनती थमती नहीं,  
ज़िन्दगी बेदम!  
नियति और नीयत के चक्र में  
लहूलूहान मन,  
ज़िन्दगी कबतक?  

- जेन्नी शबनम (21. 3. 2017)  

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Saturday, March 18, 2017

539. रेगिस्तान...

रेगिस्तान...

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मुमकिन है यह उम्र  
रेगिस्तान में ही चुक जाए  
कोई न मिले उस जैसा  
जो मेरी हथेलियों पर  
चमकते सितारों वाला  
आसमान उतार दे!  

यह भी मुमकिन है  
एक और रेगिस्तान  
सदियों-सदियों से  
बाँह पसारे मेरे लिए बैठा हो  
जिसकी हठीली ज़मीन पर  
मैं खुशबू के ढाई बोल उगा दूँ!  

कुछ भी हो सकता है  
अनदेखा अनचाहा  
अनकहा अनसुना  
या यह भी कि तमाम ज़माने के सामने  
धड़धड़ाता हुआ कँटीला मौसम आए  
और मेरे पेशानी से लिपट जाए! 

यह भी तो मुमकिन है  
मैं रेगिस्तान से याराना कर लूँ  
शबो सहर उसके नाम गुनगुनाऊँ  
साथ जीने मरने की कस्में खाऊँ  
और एक दूसरे के माथे पर  
अपने लहू से ज़िन्दगी लिख दूँ!  

- जेन्नी शबनम (18. 3. 2017)

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Monday, March 13, 2017

538. जागा फागुन (होली के 10 हाइकु)

जागा फागुन 

(होली के 10 हाइकु)

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1.  
होली कहती  
खेलो रंग गुलाल  
भूलो मलाल!  

2.  
जागा फागुन  
एक साल के बाद,  
खिलखिलाता!  

3.  
सब हैं रँगे  
फूल तितली भौंरे  
होली के रंग!  

4.  
खेल तो ली है  
रंग-बिरंगी होली  
रँगा न मन!  

5.  
छुपती नहीं  
होली के रंग से  
मन का पीर!  

6.  
रंग अबीर  
तन को रँगे, पर  
मन फ़क़ीर!  

7.  
रंगीली होली  
इठलाती आई है  
मस्ती छाई है!  

8.  
उड़ के आता  
तन मन रँगता  
रंग गुलाल!  

9.  
मुर्झाए रिश्ते  
किसकी राह ताके  
होली बेरंग!  

10.  
रंग अबीर  
फगुनाहट लाया  
मन बौराया!  

- जेन्नी शबनम (12. 3. 2017)

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Wednesday, March 1, 2017

537. हवा बसन्ती (बसन्त ऋतु पर 10 हाइकु)

हवा बसन्ती  
(बसन्त ऋतु पर 10 हाइकु)

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1.  
हवा बसन्ती  
लेकर चली आई  
रंग बहार!  

2.  
पीली ओढ़नी  
लगती है सोहणी  
धरा ने ओढ़ी!  

3.  
पीली सरसों  
मस्ती में झूम रही,  
आया बसन्त!  

4.  
कर शृंगार  
बसन्त ऋतु आई  
बहार छाई!  

5.  
कोयल कूकी -  
आओ सखी बसन्त!  
साथ में नाचें!  

6.  
धूप सुहानी  
छटा है बिखेरती  
झूला झूलती!  

7.  
पात झरते,  
जीवन होता यही,  
सन्देश देते!  

8.  
विदा हो गया  
ठिठुरता मौसम,  
रुत सुहानी!  

9.  
रंग फैलाती  
कूदती-फाँदती ये,  
बसन्ती हवा!  

10.  
मधुर तान  
चहूँ ओर छेड़ती  
हवा बसन्ती!  

- जेन्नी शबनम (1. 3. 2017)

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Monday, January 23, 2017

536. मुआ ये जाड़ा (ठंड के हाइकु 10)

मुआ ये जाड़ा  
(ठंड के हाइकु 10)

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1.  
रज़ाई बोली -  
जाता क्यों न जाड़ा,
अब मैं थकी!  

2.  
फिर क्यों आया  
सबको यूँ कँपाने,  
मुआ ये जाड़ा!  

3.  
नींद से भागे
रज़ाई मे दुबके  
ठंडे सपने!  

4.  
सूरज भागा  
थर-थर काँपता,  
माघ का दिन!  

5.  
मुँह तो दिखा -  
कोहरा ललकारे,  
सूरज छुपा!  

6.  
जाड़ा! तू जा न -  
करती है मिन्नतें,
काँपती हवा!  

7.  
रवि से डरा  
दुम दबा के भागा  
अबकी जाड़ा!  

8.  
धुंध की शाल  
धरती ओढ़े रही  
दिन व रात!  

9.  
सबको देती  
ले के मुट्ठी में धूप,  
ठंडी बयार!  

10.  
पछुआ हवा  
कुनमुनाती गाती  
सूर्य शर्माता!  

- जेन्नी शबनम (23. 1. 2017)  

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Monday, January 16, 2017

535. तुम भी न बस कमाल हो...

तुम भी न बस कमाल हो...  

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धत्त!
तुम भी न  
बस कमाल हो!  
न सोचते  
न विचारते  
सीधे-सीधे कह देते  
जो भी मन में आए  
चाहे प्रेम  
या गुस्सा  
और नाराज़ भी तो बिना बात ही होते हो  
जबकि जानते हो  
मनाना भी तुम्हें ही पड़ेगा  
और ये भी कि  
हमारी ज़िन्दगी का दायरा  
बस तुम तक  
और तुम्हारा  
बस मुझ तक  
फिर भी अटपटा लगता है  
जब सबके सामने  
तुम कुछ भी कह देते हो  
तुम भी न  
बस कमाल हो!  

- जेन्नी शबनम (16. 1. 2017)

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Sunday, January 1, 2017

534. जीवन को साकार करें...

जीवन को साकार करें...  

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अति बुरी होती है  
साँसों की हो  
या संयम की  
विचलन की हो  
या विभोर की  
प्रेम की हो  
या परित्याग की  
जीवन सहज है  
जीवन प्रवाह है  
जीवन निरंतर है  
जीवन मंगल है  
अतियों का त्याग कर  
सीमित को अपना कर  
जीवन के लय में बह कर  
जीवन का सत्कार करें  
जीवन को साकार करें!  

- जेन्नी शबनम (1. 1. 2017)

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Saturday, December 10, 2016

533. जग में क्या रहता है (9 माहिया)

जग में क्या रहता है  
(9 माहिया)

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1.  
जीवन ये कहता है  
काहे का झगड़ा  
जग में क्या रहता है!  

2.  
तुम कहते हो ऐसे  
प्रेम नहीं मुझको  
फिर साथ रही कैसे!  

3.  
मेरा मौन न समझे  
कैसे बतलाऊँ  
मैं टूट रही कबसे!  

4.  
तुम सब कुछ जीवन में  
मिल न सकूँ फिर भी  
रहते मेरे मन में!  

5.  
मुझसे सब छूट रहा  
उम्र ढली अब तो  
जीवन भी टूट रहा!  

6.  
रिश्ते कब चलते यूँ  
शिकवे बहुत रहे  
नाते जब जलते यूँ!  

7.  
सपना जो टूटा है  
अँधियारा दिखता  
अपना जो रूठा है!  

8.  
दुनिया का कहना है  
सुख-दुख जीवन है  
सबको ही बहना है!  

9.  
कहती रो के धरती  
न उजाड़ो मुझको  
मैं निर्वसना मरती!  

- जेन्नी शबनम (6. 12. 2016)  

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Sunday, November 27, 2016

532. मानव नाग...

मानव नाग...   

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सुनो   
अगर सुन सको तो   
ओ मानव केंचुल में छुपे नाग   
डँसने की आज़ादी तो मिल गई तुम्हें   
पर जीत ही जाओगे   
यह भ्रम क्यों   
केंचुल की ओट में छुपकर   
नाग जाति का अपमान   
करते हो क्यों   
नाग बेवजह नहीं डँसता   
पर तुम?  
धोखे से कबतक   
धोखा दोगे   
बिल से बाहर आकर   
पृथक होना ही होगा   
छोड़ना ही होगा केंचुल तुम्हें   
कौन नाग कौन मानव   
किसका केंचुल किसका तन   
बीन बजाता संसार सारा   
वक़्त के खेल में सब हारा   
ओ मानव नाग   
कबतक बच पाओगे   
नियति से आख़िर हार जाओगे   
समय रहते   
मानव बन जाओ   
या फिर वह होगा   
जो होता है   
ज़हरीले नाग का अंत   
सदैव क्रूर ही होता है।   

- जेन्नी शबनम (27. 11. 2016)
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